भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने सोशल मीडिया पर फैल रही उन अफवाहों को खारिज कर दिया है जिनमें दावा किया जा रहा था कि भारतीय नोटों से महात्मा गांधी की तस्वीर हटाई जा सकती है। केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया है कि ये दावे पूरी तरह से निराधार हैं और इनमें कोई सच्चाई नहीं है। इस क्लैरिफिकेशन ने देश की मौद्रिक पहचान को लेकर चल रही चर्चाओं पर विराम लगा दिया है।
महात्मा गांधी की तस्वीर को लेकर चल रही अफवाहों ने आम जनता के बीच काफी भ्रम पैदा कर दिया था। कई लोग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर शेयर किए जा रहे दावों को सच मान बैठे थे। लेकिन, आरबीआई की ओर से जारी आधिकारिक बयान ने इन सभी कयासों पर पूर्ण विराम लगा दिया है।
करेंसी डिजाइन बदलने को लेकर क्या है आरबीआई का स्पष्टीकरण?
भारतीय रिजर्व बैंक ने इन अफवाहों को गंभीरता से लिया और तुरंत सामने आकर स्थिति स्पष्ट की। आरबीआई ने कहा कि महात्मा गांधी की फोटो भारतीय नोटों पर बनी रहेगी। केंद्रीय बैंक ने यह भी बताया कि सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही यह खबर पूरी तरह से गलत है और इसका बैंक की किसी भी मौजूदा या भविष्य की नीति से कोई लेना-देना नहीं है।
आरबीआई ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर भविष्य में करेंसी डिजाइन में कोई बड़ा बदलाव किया जाता है, तो उसकी घोषणा केवल आधिकारिक चैनलों के माध्यम से की जाएगी। बैंक ने नागरिकों से अपील की है कि वे सोशल मीडिया पर फैली अपुष्ट खबरों पर ध्यान न दें और किसी भी जानकारी को शेयर करने से पहले उसकी सत्यता की जांच जरूर करें।
क्या वाकई नोटों से हटाई जाएगी गांधीजी की तस्वीर?
इसका जवाब सीधा है – नहीं। भारतीय करेंसी में महात्मा गांधी की तस्वीर का होना एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। देश की सभी डिनोमिनेशन (5 रुपये से लेकर 500 रुपये तक) के नोटों पर राष्ट्रपिता की तस्वीर छपी होती है। आरबीआई ने यह सुनिश्चित किया है कि भविष्य में भी यह परंपरा बरकरार रहेगी। यह तस्वीर हमारे राष्ट्र के संघर्ष और उसके मूल्यों का प्रतिनिधित्व करती है।
डिजिटल रुपये पर गांधीजी की तस्वीर न होने का क्या कारण है?
कई लोगों के मन में यह सवाल था कि अगर डिजिटल रुपये पर गांधीजी की तस्वीर नहीं है, तो क्या इसका मतलब है कि पेपर नोटों से भी यह हटा दिया जाएगा? इस भ्रम को भी आरबीआई ने दूर किया है।
दरअसल, डिजिटल रुपया और कागजी नोट दो अलग-अलग माध्यम हैं। डिजिटल रुपया पूरी तरह से तकनीकी आधार पर काम करता है। यह ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी और सुरक्षा एन्क्रिप्शन पर केंद्रित होता है। इसलिए, इसकी डिजाइन में पारंपरिक तस्वीरों की जरूरत नहीं होती। डिजिटल और फिजिकल करेंसी का अपना-अपना महत्व और उद्देश्य है, इसलिए उनके डिजाइन में अंतर होना स्वाभाविक है।
साल 1996 में पहली बार नोटों पर छपी थी गांधीजी की फोटो
भारतीय इतिहास में महात्मा गांधी की तस्वीर पहली बार 1996 में नोटों पर आई थी। यह ‘महात्मा गांधी सीरीज’ का हिस्सा थी। उससे पहले नोटों पर सिंह की प्रतिमा (Lion Capital) छपी होती थी, जो सारनाथ के स्तंभ से ली गई थी।
गांधीजी की तस्वीर को नोटों पर इसलिए शामिल किया गया ताकि देश के संघर्ष और उसके मूल्यों को और मजबूती से प्रस्तुत किया जा सके। तब से लेकर आज तक, चाहे वह पुरानी ‘महात्मा गांधी सीरीज’ हो या नई ‘महात्मा गांधी (न्यू) सीरीज’, सभी नोटों पर राष्ट्रपिता की तस्वीर मौजूद है। यह हमारी मौद्रिक प्रणाली का एक अभिन्न अंग बन चुका है।
अफवाहें कैसे फैलीं और इनसे कैसे बचें?
आज के डिजिटल युग में कोई भी जानकारी आग की तरह फैल जाती है। इन अफवाहों का भी कुछ ऐसा ही कारण था। सोशल मीडिया पर कुछ तकनीकी अपडेट या छोटे-मोटे बदलावों को तोड़ा-मरोड़ा गया और उसे गलत तरीके से पेश किया गया। जब तक आधिकारिक स्पष्टीकरण आया, तब तक यह खबर बहुत आगे निकल चुकी थी।
इस घटना ने हमें यह सिखाया है कि सरकारी नीतियों या महत्वपूर्ण बदलावों से जुड़ी जानकारी के लिए हमें हमेशा आधिकारिक स्रोतों पर ही भरोसा करना चाहिए। भारतीय रिजर्व बैंक ने समय रहते इस भ्रम को दूर कर दिया, जिससे किसी भी तरह की अनावश्यक अफवाह या भ्रम को रोका जा सका।
निष्कर्ष
भारतीय रिजर्व बैंक के इस स्पष्टीकरण ने यह साबित कर दिया है कि भारतीय नोटों पर महात्मा गांधी की तस्वीर बनी रहेगी। यह न केवल एक तस्वीर है, बल्कि यह भारत की पहचान, इतिहास और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। चाहे वह कागजी नोट हो या डिजिटल रुपया, भारतीय मुद्रा का मूल स्वरूप और उसकी प्रतिष्ठा अटूट है। आगे से किसी भी तरह की आधिकारिक जानकारी के लिए केवल RBI की वेबसाइट या विज्ञप्ति का ही सहारा लें।





